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बेगूसराय में चिकन-बिरयानी की गुणवत्ता पर सवाल, 40 दिन में 3 किलो के मुर्गे को लेकर उठी जांच की मांग

बेगूसराय में चिकन और बिरयानी की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठे हैं। पोल्ट्री फीड, एंटीबायोटिक, ग्रोथ प्रमोटर और खाद्य रंगों की जांच की मांग की गई है।

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Media Darshan संवाददाता, Media Darshan
29 सितंबर 2026, 03:23 PM IST (29 सितंबर 2026) अपडेट: 1 अक्टूबर 2026, 09:52 PM IST
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पंकज कुमार | ब्यूरो

मीडिया दर्शन/बेगूसराय: अगर आप चिकन और बिरयानी खाने के शौकीन हैं तो आपको इसकी गुणवत्ता और तैयार करने के तरीके को लेकर सतर्क रहने की जरूरत है। बेगूसराय शहर के चौक-चौराहों पर बिकने वाले चिकन और बिरयानी की गुणवत्ता को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। खासकर मुलायम मांस और आसानी से खाने की वजह से बच्चे और युवा इसे काफी पसंद करते हैं। स्कूल की छुट्टी के बाद कई बच्चे बिरयानी की दुकानों पर पहुंचते हैं। ऐसे में खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और स्वच्छता की जांच बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

बाजार में कम समय में बड़े आकार के मुर्गे उपलब्ध होने से पोल्ट्री फार्म में इस्तेमाल होने वाली दवाओं, ग्रोथ प्रमोटर और फीड की गुणवत्ता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। वहीं, बिरयानी में स्वाद, खुशबू और रंग बढ़ाने के लिए इस्तेमाल होने वाले खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता तथा उनकी सुरक्षित मात्रा की जांच की जरूरत बताई जा रही है।

40 दिन में 3 किलो के मुर्गे को लेकर उठे सवाल

पोल्ट्री कारोबार में कम समय में मुर्गे का वजन बढ़ाकर बाजार में भेजना आम व्यावसायिक प्रक्रिया है, लेकिन जब करीब 40 दिन में तीन किलो तक के मुर्गे बाजार में पहुंचने की बात सामने आती है तो इस्तेमाल किए जाने वाले फीड और अन्य पदार्थों की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।

आरोप है कि अधिक मुनाफे के लिए कुछ पोल्ट्री फार्मों में मुर्गियों को एनरोफ्लोक्सासिन, कोलिस्टिन और ऑक्सीटेट्रासाइक्लिन जैसी एंटीबायोटिक दवाओं के इस्तेमाल वाले फीड दिए जाते हैं। इसके अलावा जी-प्रमिन जैसे कथित ग्रोथ प्रमोटर, स्टेरॉयड और आर्सेनिक युक्त दाने के इस्तेमाल को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

हालांकि, इन दावों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए संबंधित पोल्ट्री फार्मों के फीड, मुर्गियों और मांस के नमूनों की वैज्ञानिक जांच जरूरी है।

एंटीबायोटिक के इस्तेमाल से AMR का खतरा

पोल्ट्री में एंटीबायोटिक के अनुचित या अत्यधिक इस्तेमाल को लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञ लंबे समय से चिंता जताते रहे हैं। ऐसे में यदि किसी खाद्य पशु में दवाओं का गलत तरीके से इस्तेमाल किया जाता है या उनके अवशेष निर्धारित सीमा से अधिक पाए जाते हैं, तो यह खाद्य सुरक्षा का गंभीर विषय बन सकता है।

एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस यानी AMR की स्थिति में संक्रमण पैदा करने वाले सूक्ष्मजीवों पर कुछ दवाओं का असर कम हो सकता है। इसी वजह से पोल्ट्री फार्मों में दवाओं के इस्तेमाल, फीड की गुणवत्ता और मांस में दवा के अवशेषों की जांच महत्वपूर्ण मानी जाती है।

बिरयानी में खुशबू और रंग को लेकर भी सवाल

शहर के प्रमुख चौक-चौराहों पर बिकने वाली बिरयानी की गुणवत्ता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि कुछ दुकानों में स्वाद और खुशबू बढ़ाने के लिए अजीनोमोटो यानी MSG, सिंथेटिक केवड़ा एसेंस और लाल-पीले रंगों का इस्तेमाल किया जाता है।

इसके अलावा कई जगहों पर खुले में बिरयानी और अन्य खाद्य पदार्थों की बिक्री होने से धूल-मिट्टी और मक्खियों के संपर्क में आने का खतरा भी रहता है। ऐसे में भोजन की स्वच्छता, इस्तेमाल होने वाले खाद्य रंग, फ्लेवर और अन्य सामग्री की गुणवत्ता की जांच जरूरी हो जाती है।

खाद्य पदार्थों में किसी भी एडिटिव या रंग का इस्तेमाल निर्धारित खाद्य सुरक्षा मानकों के अनुसार होना चाहिए। इसलिए सिर्फ आरोपों के आधार पर किसी खाद्य पदार्थ को जहरीला कहना उचित नहीं होगा; इसकी वास्तविक स्थिति नमूनों की वैज्ञानिक जांच से ही स्पष्ट हो सकती है।

बच्चों की सेहत को लेकर विशेष चिंता

चिकन और बिरयानी जैसे खाद्य पदार्थ बच्चों में काफी लोकप्रिय हैं। स्कूल की छुट्टी के बाद बच्चे अक्सर दुकानों से बिरयानी और अन्य फास्ट फूड खरीदकर खाते हैं। ऐसे में यदि किसी खाद्य पदार्थ में मिलावट, प्रतिबंधित पदार्थ, निर्धारित सीमा से अधिक एडिटिव या हानिकारक रसायन पाए जाते हैं तो बच्चों के स्वास्थ्य पर इसके असर को लेकर चिंता बढ़ सकती है।

इन खाद्य पदार्थों के सेवन को लेकर मोटापा, हार्मोन से जुड़ी समस्याओं, पेट संबंधी बीमारी, फूड प्वाइजनिंग, टायफाइड तथा लिवर और किडनी से जुड़ी समस्याओं जैसी आशंकाएं जताई गई हैं। लंबे समय तक कुछ हानिकारक पदार्थों के संपर्क में रहने को लेकर गंभीर स्वास्थ्य जोखिमों की चर्चा भी होती है। हालांकि, किसी विशेष बीमारी या कैंसर को सीधे तौर पर चिकन या बिरयानी के सेवन से जोड़ने के लिए वैज्ञानिक प्रमाण और संबंधित खाद्य पदार्थों की जांच जरूरी है।

जांच नहीं हुई तो बढ़ सकती है चिंता

खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता को लेकर उठ रहे सवालों के बीच जिला प्रशासन और खाद्य सुरक्षा विभाग की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। पोल्ट्री फार्मों में इस्तेमाल होने वाले फीड, दवाओं और ग्रोथ प्रमोटर की जांच के साथ-साथ बाजार में बिक रहे चिकन के नमूने लिए जा सकते हैं।

इसी तरह बिरयानी और अन्य खाद्य दुकानों से खाद्य नमूने लेकर उनमें इस्तेमाल होने वाले रंग, फ्लेवर और अन्य एडिटिव की जांच कराई जा सकती है। दुकानों में साफ-सफाई, भोजन को ढककर रखने, खाद्य पदार्थों के भंडारण और स्वच्छता मानकों की भी जांच जरूरी है।

स्थानीय स्तर पर मांग उठ रही है कि जिला प्रशासन और खाद्य सुरक्षा विभाग पोल्ट्री फार्मों तथा बिरयानी दुकानों का निरीक्षण कर संदिग्ध खाद्य पदार्थों के नमूने लें और प्रयोगशाला जांच के आधार पर कार्रवाई करें। यदि जांच में नियमों का उल्लंघन सामने आता है तो संबंधित जिम्मेदार लोगों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।

समय रहते जांच की जरूरत

खाद्य सुरक्षा से जुड़े मामलों में समय पर जांच और निगरानी बेहद जरूरी है। लोगों की थाली तक पहुंचने वाले चिकन और बिरयानी की गुणवत्ता को लेकर यदि कोई शिकायत या संदेह है तो उसका समाधान वैज्ञानिक जांच से होना चाहिए। इससे एक तरफ उपभोक्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित होगी, वहीं दूसरी तरफ नियमों का पालन करने वाले कारोबारियों पर भी बेवजह सवाल नहीं उठेंगे।

इसलिए जिला प्रशासन और खाद्य सुरक्षा विभाग से पोल्ट्री फार्मों तथा बिरयानी दुकानों की जांच और सैंपलिंग कराने की मांग की जा रही है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि बाजार में बिकने वाले चिकन और बिरयानी में वास्तव में किसी प्रतिबंधित या निर्धारित सीमा से अधिक पदार्थ का इस्तेमाल तो नहीं किया जा रहा है।