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असम चुनाव में कांग्रेस से अलग JMM की राह, दो सीटों से बढ़ी सियासी दूरी

असम विधानसभा चुनाव को लेकर विपक्षी दलों के बीच संभावित गठबंधन की चर्चा के बीच Jharkhand Mukti Morcha (जेएमएम) ने अलग रास्ता चुन लिया है। पार्टी ने कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की संभावनाओं पर विराम लगाते हुए अपने उम्मीदवारों की घोषणा क

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satyam kumar sinha संवाददाता, Media Darshan
27 मार्च 2026, 07:50 PM IST (27 मार्च 2026) अपडेट: 15 अक्टूबर 2026, 11:27 PM IST
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असम विधानसभा चुनाव को लेकर विपक्षी दलों के बीच संभावित गठबंधन की चर्चा के बीच Jharkhand Mukti Morcha (जेएमएम) ने अलग रास्ता चुन लिया है। पार्टी ने कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की संभावनाओं पर विराम लगाते हुए अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है, जिससे सियासी समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं।

दरअसल, जेएमएम ने दो अहम विधानसभा सीटों—मजबत और सोनारी—से अपने प्रत्याशियों का ऐलान किया। मजबत से प्रीति रेखा बर्लो और सोनारी से बलदेव तेली को उम्मीदवार बनाए जाने के साथ ही Indian National Congress के साथ गठबंधन की संभावनाएं लगभग खत्म हो गईं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला सिर्फ सीटों के बंटवारे का मुद्दा नहीं, बल्कि इसके पीछे व्यापक रणनीति काम कर रही है।

झारखंड के मुख्यमंत्री Hemant Soren असम चुनाव के जरिए खास सामाजिक वर्ग तक अपनी पहुंच बनाना चाहते हैं। खासकर चाय बागानों में काम करने वाले ‘टी-ट्राइब’ समुदाय, जिनकी जड़ें झारखंड से जुड़ी हैं, जेएमएम की राजनीति का केंद्र बन गए हैं। यह वही समुदाय है, जिसे लंबे समय से असम में अनुसूचित जनजाति का दर्जा नहीं मिला है। जेएमएम इसी मुद्दे को चुनावी एजेंडा बनाकर मैदान में उतर रही है।

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पार्टी नेताओं का कहना है कि झारखंड में किए गए विकास कार्यों को मॉडल के तौर पर असम में पेश किया जाएगा। जेएमएम का दावा है कि उसने विस्तृत सर्वे के बाद ही उन क्षेत्रों का चयन किया है, जहां पार्टी को समर्थन मिलने की संभावना अधिक है। इसी रणनीति के तहत पार्टी ने असम में कई सीटों पर उम्मीदवार उतारने का फैसला किया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि जेएमएम का यह कदम क्षेत्रीय राजनीति को राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार देने की कोशिश है। हालांकि, कांग्रेस से अलग होकर चुनाव लड़ना विपक्षी वोटों के बंटवारे का कारण भी बन सकता है, जिसका फायदा अन्य दल उठा सकते हैं।

फिलहाल, असम चुनाव में जेएमएम की यह रणनीति कितना असर डालती है, यह चुनाव परिणाम आने के बाद ही साफ हो पाएगा, लेकिन इतना तय है कि इस फैसले ने राज्य की सियासत को नया मोड़ दे दिया है।

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